Mulayam singh yadav political tree or dynasty in indian politician
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भारतीय राजनीति में परिवारवाद की नींव रखने का श्रेय कांग्रेस को दिया जा सकता है, लेकिन इस परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया समाजवादी पार्टी ने। इसमें मुलायम सिंह यादव का सबसे अधिक योगदान माना जाता है। मुलायम पर अकसर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है, लेकिन यादव कुनबे के लोग इसे वक्त की मांग बताते हुए पूरे परिवार को राजनीति में आने के निर्णय को सही मानते हैं। मुलायम के जन्मदिन पर पेश है उनके कुनबे के राजनीति में आने की कहानी।
एक साधारण से परिवार से निकल कर भारतीय राजनीति के आसमान पर अपनी जगह बनाने वाले मुलायम के जीवन में दिलचस्प मोड़ आते गए और मुलायम उन्हें बखूबी पार करते गए। राजनीति में परिवार की सक्रियता का श्रेय भी मुलायम को दिया जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार हो या यूपी में उनके पुत्र अखिलेश यादव की सरकार जब भी संकट का दौर आया। तीसरे मोर्चे का नाम लेकर मुलायम सिंह यादव आए।
उनका जन्म यूपी के इटावा जिले के सैफई में 22 नवम्बर, 1939 को हुआ था। इनके पिता का नाम सुघर सिंह था और माता का नाम मूर्ति देवी था। पांच भाइयों में तीसरे नंबर के मुलायम सिंह के दो विवाह हुए हैं, पहली मालती देवी, जिनके निधन के पश्चात उन्होंने सुमन गुप्ता से विवाह किया। अखिलेश यादव मालती देवी के पुत्र हैं, जबकि मुलायम के छोटे बेटे प्रतीक यादव को उनकी दूसरी पत्नी सुमन ने जन्म दिया है। वर्ष 1954 में पंद्रह साल की किशोरावस्था में ही मुलायम के राजनीतिक तेवर उस वक्त देखने को मिले, जब उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के आह्वान पर 'नहर रेट आंदोलन' में भाग लिया और पहली बार जेल गए।
1967 में पहली बार चुने गए विधायक

डॉ. लोहिया ने फर्रुखाबाद में बढ़े हुए नहर रेट के विरुद्ध आंदोलन किया और जनता से बढ़े हुए टैक्स न चुकाने की अपील की थी। इस आंदोलन में हजारों सत्याग्रही गिरफ्तार हुए। इसमें मुलायम भी शामिल थे। इसके बाद वे 28 वर्ष की आयु में वर्ष-1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर पहली बार जसवंत नगर क्षेत्र से विधानसभा सदस्य चुने गए। इसके बाद वह 1974, 77, 1985, 89, 1991, 93, 96 और 2004 और 2007 में बतौर विधान सभा सदस्य चुने गए। इस बीच वे 1982 से 1985 तक यूपी विधान परिषद के सदस्य और नेता विरोधी दल रहे। पहली बार 1977-78 में राम नरेश यादव और बनारसी दास के मुख्यमंत्रित्व काल में सहकारिता एवं पशुपालन मंत्री बनाए गए। इसके बाद से ही वे करीबी लोगों के बीच मंत्री जी के नाम से जाने जाने लगे।
बीजेपी के समर्थन से पहली बार बने थे सीएम
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के समर्थन के साथ मुलायम पहली बार पांच दिसंबर 1989 को 53 वर्ष की उम्र में यूपी के मुख्यमंत्री बने, लेकिन बीजेपी की रामजन्म भूमि यात्रा के दौरान मुलायम और बीजेपी के संबंधों में दरार आ गई। इसका कारण था मुलायम सिंह यादव का आडवाणी की रथ यात्रा को सांप्रदायिक करार देना और इसे अयोध्या ना पहुंचने देने पर अड़ जाना। दो नवंबर 1990 को अयोध्या में बेकाबू हो गए कारसेवकों पर यूपी पुलिस को गोली चलने का आदेश देकर मुलायम विवादों में आ गए। इस फायरिंग में कई कारसेवक मारे गए थे। हालांकि अभी हाल में ही उन्होंने अपने इस फैसले पर अफसोस भी जताया है।
मंत्री बनते ही मुलायम ने उठाए थे सख्त कदम

मुलायम को 1977-78 में जब पहली बार मंत्री बनाया गया, तो उन्होंने एक क्रान्तिकारी कदम उठाया था, जिससे न केवल यूपी को फायदा हुआ, बल्कि कहने को तो समाजवादी पार्टी में आज के परिवारवाद की नींव भी उसी समय पड़ी। बतौर यूपी के सहकारिता एवं पशुपालन मंत्री मुलायम सिंह यादव ने पहले किसानों को एक लाख क्विंटल और उसके दूसरे साल 2.60 लाख क्विंटल बीज बंटवाए।
उनके इसी कार्यकाल में यूपी में डेयरी का उत्पादन बढ़ा। मुलायम ने समाजवाद के साथ जो शुरुआत की वह आगे चलकर परिवारवाद का कारण बना। मुलायम के इस सहकारिता आंदोलन के चलते उनके सबसे छोटे भाई शिवपाल को राजनीति में आने का रास्ता मिला। सहकारी क्षेत्र में अपनी पैठ बनाते हुए 1988 में शिवपाल पहली बार इटावा के जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष चुने गए।
तेरह वर्षों तक सहकारी बैंक का अध्यक्ष रहने के बाद 1991 में दो वर्षों के लिए यह पद शिवपाल से दूर रहा और वह दोबारा 1993 में सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने और पिछले 20 वर्षों से उसी पद पर बने हुए हैं। शिवपाल की पत्नी सरला भी 2013 में जिला सहकारी बैंक की राज्य प्रतिनिधि के रूप में लगातार दूसरी बार चुनी गई हैं। यही नहीं, शिवपाल के बेटे आदित्य यादव उर्फ अंकुर को भी यूपी प्रादेशिक कोऑपरेटिव फेडरेशन का निर्विरोध अध्यक्ष चुना गया है।
मुलायम सिंह यादव 1989 से 1991 तक, 1993 से 1995 तक और साल 2003 से 2007 तक तीन बार यूपी के मुख्यमंत्री रहे हैं। वर्ष 2013 में एक बार फिर जब उनके मुख्यमंत्री बनने का मौका आया तो मुलायम इस बार केंद्र की सरकार में अपना महत्वपूर्ण रोल देख रहे थे और उन्होंने अपने बेटे अखिलेश यादव के हाथों में यूपी की कमान सौंप दी। वैसे मुलायम वर्ष-1996 से ही केंद्र की राजनीति में सक्रिय हो गए थे और उन्होंने अपनी महत्ता भी अन्य राजनैतिक पार्टियों को समझा दी थी। मुलायम सिंह यादव 1996, 1998, 1999, 2004, 2009 और 2014 में लोकसभा के सदस्य चुने गए।
1992 में बनाई समाजवादी पार्टी

मुलायम के सिर पर वर्ष 1992 में एक और सेहरा बंधा, जब उन्होंने पांच नवंबर 1992 को लखनऊ में समाजवादी पार्टी की स्थापना की। देश के राजनैतिक इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण अध्याय था, क्योंकि लगभग डेढ़-दो दशकों से हाशिए पर पहुंच गए समाजवादी आंदोलन में मुलायम ने जान डाल दी थी। इसके अगले वर्ष ही 1993 में हुए विधान सभा चुनावों में समाजवादी पार्टी का गठबंधन बीएसपी से हुआ। हालांकि इस गठजोड़ को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, लेकिन जनता दल और कांग्रेस के समर्थन के साथ उन्होंने दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
इस बार उन्हों उत्तराखंड के निर्माण को लेकर भी कई विवादों का सामना करना पड़ा। अलग राज्य की मांग कर रहे आंदोलनकारियों पर एक अक्टूबर 1994 दिल्ली में धरना प्रदर्शन के लिए जा रहे थे, उस दौरान यूपी पुलिस ने मुजफ्फरनगर जिले के रामपुर तिराहे के पास आंदोलनकारियों पर गोली चला दी। इसमें 6 आंदोलनकारियों की मौत हो गई थी और आरोप यह भी लगा कि कुछ महिलाओं के साथ छेड़खानी और बलात्कार भी किया गया। इससे पहले मुलायम लोकदल और जनता दल के यूपी के अध्यक्ष भी रहे। मुलायम 1996 से 1998 तक एचडी देवेगौड़ा और इन्द्र कुमार गुजराल की सरकारों में केंद्रीय रक्षामंत्री के पद पर भी रहे हैं।
जब गोली लगने से बाल-बाल बच गए थे मुलायम सिंह यादव

मशहूर पत्रकार स्वर्गीय आलोक तोमर ने अपने संस्मरण में लगभग 42 वर्ष पुरानी घटना का जिक्र करते हुए लिखा है, "उन दिनों बलरई में सहकारी बैंक खुली। ये चालीस साल पुरानी बात है। मास्टर मुलायम सिंह चुनाव में खड़े हुए और इलाके के बहुत सारे अध्यापकों और छात्रों के माता-पिताओं को पांच-पांच रुपए में सदस्य बना कर चुनाव भी जीत गए।
उनके साथ बैंक में निदेशक का चुनाव मेरे स्वर्गीय ताऊ जी ठाकुर ज्ञान सिंह भी जीते थे। चुनाव के बाद जो जलसा हो रहा था उसमें गोली चल गई। मुलायम और मेरे ताऊ जी बात कर रहे थे। छोटे कद के होने की वजह से मुलायम के ऊपर से गोली निकल गई, लेकिन पीछे खड़े एक लंबा आदमी, वहीं पर ढ़ेर हो गया।"
इंस्पेक्टर को मुलायम ने उठाकर पटक दिया
इसी तरह एक और दिलचस्प किस्सा मुलायम सिंह यादव के बारे में सुनने को मिलता है कि वर्ष 1960 में मैनपुरी के करहल स्थित जैन इंटर कॉलेज में एक कवि सम्मेलन चल रहा था। जैसे ही उस समय के विख्यात कवि दामोदर स्वरूप 'विद्रोही' ने अपनी चर्चित रचना दिल्ली की गद्दी सावधान सुनानी शुरू की एक पुलिस इंस्पेक्टर ने विद्रोही जी से माइक छीन कर बोला कि सरकार के खिलाफ कविताएं पढ़ना बंद करो।
इसी बीच उसी समय एक लड़का बड़ी फुर्ती से मंच पर चढ़ा और उस इंस्पेक्टर को मंच पर ही उठाकर पटक दिया। बाद में लोगों ने पूछा कि ये यह साहसी नौजवान कौन था, तो पता चला कि वह मुलायम सिंह यादव है। बाद में जब मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री बनें, तो उन्होंने दामोदर स्वरूप 'विद्रोही' को यूपी हिन्दी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान से नवाजा।
सबसे कम उम्र में सीएम बने अखिलेश यादव

पिछले यूपी विधान सभा चुनावों में एक अंडर करंट चल रही थी, जिसे बड़े बड़े प्रकांड राजनीतिज्ञ नहीं समझ सके। जब चुनाव परिणाम घोषित हुए तब कहीं जाकर लोगों को इस अंडर करंट का अंदाजा लगा। उस वक्त मीडिया भी कांग्रेस के युवराज की जनसभाओं में जुट रही भीड़ पर अपना ध्यान केंद्रित किए हुए था। एक शख्स चुपचाप पूरे प्रदेश में साइकिल यात्रा और रथ यात्रा के जरिए लोगों को अपने से जोड़ रहा था। चुनाव परिणाम घोषित हुए और तेजी से बदलते घटनाक्रम में इस युवा को प्रदेश के मुख्यमंत्री का ताज पहना दिया गया। अखिलेश यादव 15 मार्च 2012 को यूपी के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने।
अखिलेश यादव ने डिंपल के लिए छोड़ दी थी सीट
लोकसभा की वेबसाइट के अनुसार अखिलेश ने अपने आपको राजनीतिज्ञ के अलावा किसान, इंजीनियर और समाज सेवी बताया है। अखिलेश वर्ष 2000 में 27 वर्ष कि आयु में पहली बार लोकसभा के सदस्य बने थे। उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने उस समय कन्नौज और मैनपुरी दोनों जगहों से लोकसभा का चुनाव लड़ा था और दोनों ही जगहों से विजयी भी रहे। बाद में मुलायम ने कन्नौज की सीट खाली कर दी और उपचुनाव में वहां से अखिलेश को टिकट दिया गया।
अखिलेश कन्नौज से विजयी होकर लोकसभा पहुंचे। तब से अखिलेश तीन बार लोकसभा सदस्य रह चुके हैं। वर्ष 2009 में अखिलेश ने भी दो लोकसभा सीट कन्नौज और फिरोजाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ा। वे भी दोनों जगहों से विजयी रहे, फिरोजाबाद की सीट उन्होंने अपनी पत्नी डिंपल यादव के लिए खाली कर दी, लेकिन अफ़सोस कि इस बार यह रणनीति काम न आई और डिंपल फिल्म स्टार और कांग्रेस के उम्मीदवार राज बब्बर से चुनाव हार गईं।
वर्ष 2013 के विधान सभा चुनावों के लिए अखिलेश ने काफी पहले से तैयारी शुरू कर दी थी। इसके लिए उन्होंने 6 महीनों में 10 हजार किलोमीटर से ज्यादा की यात्रा की और इस दौरान 800 रैलियों को संबोधित किया। उनके प्रोफेशनल नजरिये के चलते सपा ने चुनावों में ज्यादातर प्रोफेशनली क्वालिफाइड लोगों कि टिकट दिया ताकि पार्टी की पिछली इमेज को बदला जा सके। इसी का नतीजा था कि सपा पूर्ण बहुमत के साथ प्रदेश में सत्ता में वापस आई। इस बदलाव को परखते हुए सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह ने भी मुख्यमंत्री के लिए अखिलेश का नाम प्रस्तावित किया जो पार्टी की थोड़ी बहुत अंदरूनी कशमकश के बाद सभी ने स्वीकार कर लिया। मंत्रिमंडल में भी अखिलेश ने नई और पुरानी दोनों पीढ़ियों का समावेश रखा।
अखिलेश यादव हालांकि अपने पिता मुलायम की छत्र-छाया में ही शासन चला रहे हैं, लेकिन उनके कुछ फैसले मुसीबत का सबब भी बन गए। उन्होंने डीपी यादव जैसे दागी नेताओं को पार्टी से दूर रखने के का फैसला लिया, तो उनकी चारों ओर सराहना हुई, लेकिन जब मंत्रिमंडल का गठन हुआ तो कई दागी चेहरों के शामिल हो जाने चलते उन्हें आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा।
सीएम अखिलेश के जीवन के कुछ रोचक पहलू

1. अखिलेश के घर का नाम टीपू है। बचपन में जब वे जब सेंट मेरी स्कूल में दाखिले के लिए पहुंचे तो उनके साथ न तो पिता मुलायम थे और न ही चाचा शिवपाल। उनके साथ पारिवारिक मित्र अवध बिहारी बाजपेयी और वकील गए थे। जब वहां अखिलेश से नाम पूछा गया तो उन्होंने अपना नाम 'टीपू' बता दिया। जब स्कूल वालों ने कहा कि यह नाम स्कूल में नहीं लिखा जा सकता, तो वहीं उनका नाम टीपू से अखिलेश हो गया।
2. एक सभा के दौरान यूपी में खेलों के विकास के लिए राज्य मंत्री दर्जा प्राप्त राम वृक्ष यादव ने बताया कि अखिलेश यादव फुटबाल बहुत अच्छा खेलते हैं। बचपन में फुटबाल खेलते समय नाक पर फुटबाल लग गया था, तभी से उनकी नाक टेढ़ी हो गई।
3. मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश के कैंप ऑफिस का स्टाफ उनके नाम आने वाले प्रेम पत्रों को लेकर काफी परेशान रहा। अधिकतर पत्रों में शादी का प्रस्ताव था और शादी न करने पर आत्महत्या की धमकी होती थी।
4. चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश के पजेरो गाड़ी में उनकी बीएमडब्ल्यू साइकिल रखी होती थी, जिसे वे साइकिल रैली में प्रयोग करते थे।
5. पार्टी की छवि के उलट अखिलेश टेक्नोलॉजी को पसंद करते हैं। उनके पास चुनाव प्रचार के दौरान दो दो ब्लैकबेरी फोन थे और वे आई पैड पर पार्टी के प्रचार अभियान का वीडियो देखते थे।
6. सरकार बनाने के बाद से उनके पिता और सपा सुप्रीमो उनकी कार्यशैली को लेकर कई बार नाराजगी जाता चुके हैं।
7. अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद विदेशी मीडिया भी उनके व्यक्तित्व को लेकर काफी उत्साहित था। प्रदेश में निवेश की संभावनाओं को देखते हुए कई देशों का प्रतिनिधि मंडल उनसे लखनऊ और दिल्ली में मुलाकात कर चुका है।
8. अखिलेश यादव के 18 महीने के कार्यकाल में 2000 अधिकारियों का ट्रांसफर हो चुका है। गोरखपुर के एसएसपी रहे शलभ माथुर को, तो छह महीने के अन्दर चार बार ट्रांसफर ऑर्डर मिले हैं।
9. मुख्यमंत्री बनने के बाद एक इंटरव्यू में अखिलेश यादव देश का प्रधानमंत्री बनने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं।
निर्विरोध चुनी गईं देश की पहली महिला सांसद हैं डिंपल यादव

यूपी के सीएम अखिलेश यादव की पत्नी और कन्नौज से चुनी गईं देश की पहली निर्विरोध सांसद डिंपल यादव किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। 1978 में पुणे आर्मी कर्नल एससी रावत के घर जन्मी डिम्पल की शुरुआती पढ़ाई और पालन पोषण पुणे, भटिंडा और अंडमान निकोबार में हुआ।
इंटरमीडिएट के बाद डिम्पल यादव ने लखनऊ यूनिवर्सिटी से ह्यूमैनिटीज में स्नातक किया। यहीं, अखिलेश यादव से उनकी मित्रता हुई। दोनों की मित्रता कब प्यार में बदल गई पता ही नहीं चला। अखिलेश एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद ऑस्ट्रेलिया से लौटे तो दोनों ने शादी कर ली। विवाह के बाद डिंपल गृहिणी बन गईं और अखिलेश अपने पिता मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी में शामिल होकर राजनीति में सक्रिय हो गए।
शादी से पहले बहुत बोल्ड थीं डिंपल

डिंपल और अखिलेश के तीन बच्चे अदिति, अर्जुन और टीना हैं। इनमें अर्जुन और टीना जुड़वां हैं। उनके पिता कर्नल रावत उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर के मूल निवासी हैं। वर्तमान में वहीं रह रहे हैं। डिम्पल की दो बहने हैं। कर्नल रावत के मुताबिक, शादी से पहले वह काफी बोल्ड हुआ करती थीं। अपनी बात बेबाकी से रखने वाली डिंपल कभी किसी बात को कहने में हिचकती नहीं थीं। अब शादी के बाद बेहद शांत स्वभाव की हो गई डिम्पल स्पोर्ट्स में काफी रूचि रखती हैं। घुड़ सवारी उनको बेहद पसंद है। इसकी वजह से आज भी पहाड़ों पर जब जाने का मौका मिलता है तो घुड़सवारी ज़रूर करती हैं।
दोस्त की जुबानी, डिंपल की कहानी
डिम्पल की कॉलेज के दिनों की खास दोस्त लखनऊ में रही साक्षी ने dainikbhaskar.com से खास बातचीत में कॉलेज के दिनों को याद करते हुए बताया कि उनमें किसी भी नई वस्तु और सोच को ग्रहण करने की क्षमता अपार है। वह किसी भी नई जगह पर जल्द ही वहां के वातावरण और हालत को ग्रहण कर लेती थीं। कॉलेज के दिनों में पढ़ने लिखने के साथ-साथ घूमने फिरने का भी शौक था। कभी उनको इसके लिए डांट भी खूब पड़ती थी। डिम्पल किसी भी दोस्त की मदद के लिए हमेशा खड़ी रहती थीं। शायद पिता आर्मी में थे और कई जगह वह रह चुकी थीं, इसका भी असर उनमें दिखाई पड़ता था।
डिम्पल का मुलायम की दूसरी पत्नी से है कम लगाव
डिंपल के दोस्त साक्षी ने बातों-बातों में चौंकाने वाली एक बात बताई। उनके मुताबिक, डिम्पल यादव की मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी और प्रतीक की मां से कुछ खास लगाव नहीं है। प्रतीक और उनकी पत्नी अपर्णा से उनके ठीक-ठाक रिश्ते हैं। नेताजी की लाडली बहु डिम्पल उनका ख्याल खूब रखती हैं। भले ही पार्टी नेता जी और अखिलेश यादव चला रहे हैं, लेकिन फैमिली बिजनेस वहीं देखती हैं।
डिम्पल इस तरह बनी सांसद
12 जून, 2012 को डिंपल यादव को संसद का टिकट मिल गया। अब उनकी असली राजनीतिक पारी शुरू हो चुकी थी। हालांकि इससे पहले भी उन्हों ने राजनीति में अपनी किस्मत फिरोजाबाद संसदीय सीट से आजमाई थी। वह सीट भी अखिलेश ने छोड़ी थी। इस पर फ़िल्म अभिनेता राज शब्बीर जीते थे। पिछली हार जैसी भी रही हो, इस बार की जीत किसी बड़ी जीत से कम नहीं थी, क्योंकि वो कन्नौज में बिना वोट पड़े ही सांसद चुन ली गईं, क्योंकि वहां किसी भी पार्टी ने उनके खिलाफ प्रत्याशी उतारा ही नहीं और वह निर्विरोध जीतीं।
राज्यसभा सांसद हैं राम गोपाल यादव

प्रो. राम गोपाल यादव समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के छोटे चचेरे भाई हैं। गरीबी में पढ़ाई और फिर पेशे से अध्यापक रहे राम गोपाल वर्तमान में यूपी से राज्यसभा के सांसद हैं। वह मुलायम सिंह यादव के थिंक टैंक और समाजवादी पार्टी के चाणक्य भी कहे जाते हैं। यादव परिवार में सबसे पढ़े लिखे केवल प्रो. रामगोपाल यादव ही हैं।
पॉलीटिकल प्रोफाइल
प्रो. रामगोपाल यादव समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और राज्य सभा सांसद हैं। वह पार्टी में मजबूत हैसियत रखते हैं। हालांकि राजनीति में लाने का श्रेय बड़े भाई मुलायम सिंह यादव को जाता है। रामगोपाल यादव ने अपने भाई शिवपाल यादव के साथ 1988 में राजनीति में कदम रखा। वह इटावा के बसरेहर ब्लॉक प्रमुख का चुनाव जीते। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
बदायूं सांसद हैं धर्मेंद्र यादव

धर्मेंद्र यादव मुलायम सिंह के बड़े भाई अभय राम के बेटे हैं। वह बदायूं से सांसद हैं और इससे पहले मैनपुरी लोकसभा सीट से चुनाव जीत चुके हैं। तब वह 14वें लोकसभा के सबसे युवा सांसद थे।
पॉलीटिकल प्रोफाइल
धर्मेंद्र यादव का राजनीति से नाता छात्र जीवन के समय से ही है। इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान समाजवादी जनेश्वर मिश्र के सानिध्य में उन्होंने छात्र राजनीति की। इलाहाबाद में सपा का परचम लहराने का श्रेय जनेश्वर मिश्र को जाता है, तो उनके सहायक के तौर पर धर्मेंद्र का भी नाम लिया जाता है।
जब धर्मेंद्र एमए की पढ़ाई पूरी करने वाले थे तभी वर्ष 2003 में मुलायम सिंह यादव ने उन्हें सैफई बुला लिया। तब धर्मेंद्र के चचेरे भाई व सैफई ब्लॉक प्रमुख रणवीर सिंह का हार्ट अटैक से अचानक मौत हो गई थी। उस समय स्थानीय राजनीति को संभालने का दायित्व मुलायम सिंह ने धर्मेंद्र को दिया। सैफई महोत्सव के सचिव वेदव्रत गुप्ता कहते हैं, उस समय सैफई को संभालने वाला धर्मेंद्र की टक्कर का कोई नहीं था।
माफिया डॉन डीपी यादव के पॉलिटिकल कॅरियर पर विराम लगाने का श्रेय भी धर्मेंद्र यादव को जाता है। डीपी यादव वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव के वक्त आजम खां के माध्यम से सपा में आने का रास्ता ढूंढ लिया था। इसको लेकर काफी राजनीति रस्साकशी हुई। तब समाजवादी पार्टी के युवा सांसद धर्मेंद्र यादव की जिद के चलते डीपी यादव को पार्टी में एंट्री नहीं मिल सकी। इसकी वजह से कुछ वक्त तक आजम खां नाराज भी रहे थे। पिछले विधानसभा चुनाव में धर्मेंद्र यादव की बदौलत बदायूं के मतदाताओं ने सपा के पांच उम्मीदवारों को विधायक बनाया था।
मुलायम के कुनबे के सातवें राजनेता है अक्षय यादव

मुलायम सिंह के कुनबे के सातवें राजनेता अक्षय यादव हैं। वह सपा महासचिव रामगोपाल यादव के बेटे और मुलायम सिंह यादव के भतीजे हैं। अक्षय ने एमबीए किया है और बीज का कारोबार संभल रहे हैं। पिछले चार साल से फिरोजाबाद सीट में कार्यकर्ताओं के साथ समय बिता रहे हैं।
पॉलीटिकल प्रोफाइल
26 वर्षीय अक्षय यादव को समाजवादी पार्टी ने फिरोजाबाद लोकसभा सीट से टिकट दिया वह जीते भी हैं। इस सीट से अक्षय का पुराना नाता है। पिछले पांच साल से इस इलाके में वह काम कर रहे हैं। जब अखिलेश यादव ने वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में फिरोजाबाद और कन्नौज से चुनाव लड़ा था, उस समय फिरोजाबाद के चुनाव प्रबंधन की कमान अक्षय ने संभाली थी।
अक्षय यादव सीधे राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में शामिल हुए हैं। जबकि इस यादव परिवार के अधिकतर सदस्य स्थानीय राजनीति से उठकर राष्ट्रीय राजनीति में आए हैं। अक्षय का सबसे बड़ा शौक रायफल शूटिंग है। वह पढ़ाई के दौरान कई बार राष्ट्रीय शूटिंग चैम्पियनशिप में हिस्सा ले चुके हैं।
मुलायम के सबसे विश्वासपात्र हैं शिवपाल

शिवपाल सिंह यादव का जन्म 6 अप्रैल, 1955 को हुआ था. उन्होंने बीए, बीपीएड किया है। उनकी शादी सरला यादव से हुई है। शिवपाल बड़े तेज-तर्रार मिजाज के माने जाते हैं। वह शिवपाल को छोड़कर मुलायम के किसी भाई का राजनीति में जाने का इरादा नहीं था। शिवपाल ने dainikbhaskar.com से बातचीत बताया कि 70 के दशक में चंबल के बीहड़ जिले इटावा में राजनीति की राह आसान नहीं थी। वर्ष 1967 में जसवंतनगर से विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मुलायम सिंह के राजनैतिक विरोधियों की संख्या काफी बढ़ चुकी थी। राजनीतिक विरोधियों ने मुलायम पर जानलेवा हमला भी कराया। यही वह समय था, जब उन्होंने (शिवपाल सिंह और चचेरे भाई रामगोपाल यादव मुलायम सिंह के साथ आए) मुलायम सिंह की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाली थी।
1988 में शिवपाल पहली बार जिला सहकारी बैंक, इटावा के अध्यक्ष बने। 1991 तक सहकारी बैंक का अध्यक्ष रहने के बाद दोबारा 1993 में शिवपाल ने यह कुर्सी संभाली और अभी तक इस पर बने हुए थे। 1996 से विधान सभा सदस्य के साथ-साथ आज कई शिक्षण संस्थाओं के प्रबंधक के साथ साथ लंबा-चौड़ा राजनैतिक इतिहास है।
राजनीति में कदम रखने वाली मुलायम के कुनबे की दूसरी महिला हैं सरला

शिवपाल की पत्नी सरला यादव परिवार की पहली महिला सदस्य है जिन्होंने बहु डिंपल से पहले ही राजनीति में कदम रखा था। शिवपाल बताते हैं कि उस समय कुछ मजबूरी ही ऐसी थी कि पत्नी को राजनीति में उतरना पड़ा, हालांकि वो सक्रिय राजनीति का हिस्सा कभी नहीं बनी और घर की देखभाल में ज्यादा समय बिताती थीं।
इसका कारण है कि अखिलेश के साथ-साथ वे मेरे दोनों बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाती थीं। सरला दो बार जिला सहकारी बैंक की राज्य प्रतिनिधि के रूप में निर्वाचित हुईं। वर्ष 2007 के बाद लगातार दूसरी बार चुनी गई थी और अब कमान उनके बेटे आदित्य के हाथ में है।
यूपीपीसीएफ के निर्विरोध अध्यक्ष हैं आदित्य

प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव के पुत्र 25 वर्षीय आदित्य यादव उर्फ अंकुर यूपी प्रादेशिक कोऑपरेटिव फेडरेशन (यूपीपीसीएफ) के निर्विरोध अध्यक्ष है। राजनीति में सफलता की पहली सीढ़ी चढ़ने के लिए आदित्य ने अपने पिता शिवपाल सिंह यादव के पद चिन्हों पर चलते हुए सहकारिता का सहारा लिया है।
खुद शिवपाल सिंह ने भी इटावा जिले के सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद से सियासी पारी की शुरुआत की थी। यूपीपीसीएफ का अध्यक्ष बनने के साथ ही आदित्य का नाम मुलायम सिंह परिवार के उन सदस्यों की सूची में 13वें नंबर पर शुमार हो गया है, जो राजनीति में एंट्री कर चुके हैं।
सहकारिता के माध्यम से ही सक्रिय राजनीति में मुलायम ने भी प्रवेश किया था। 1977 में यूपी में राम नरेश यादव के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। उस सरकार में मुलायम सिंह यादव पहली बार सहकारिता मंत्री बने थे। यहीं से प्रदेश में सहकारिता आंदोलन की शुरुआत हुई। मुलायम सिंह ने सहकारिता को नौकरशाही के चंगुल से निकालकर आम जनता से जोड़ा।
उसी दौरान यूपी में सहकारी बैंक की ब्याज दर को 14 फीसदी से घटाकर 13 फीसदी और फिर 12 फीसदी कर दिया गया। इसके बाद से मुलायम के परिवार का ही सहकारिता पर कब्जा बरकरार है। अंकुर यादव यूपी कोऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड (पीसीएफ) के सभापति पद पर बरकरार है और कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी मिला हुआ है।
राजनीति में कदम रखने वाली मुलायम के कुनबे की पहली महिला हैं प्रेमलता

मुलायम सिंह के छोटे भाई राजपाल यादव की पत्नी प्रेमलता यादव इस समय इटावा की जिला पंचायत अध्यक्ष हैं। 2005 में प्रेमलता यादव ने राजनीति में कदम रखा। यहां उन्होंने पहली बार इटावा की जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव लड़ा और जीत गईं। वर्ष-2005 में राजनीति में आने के बाद ही प्रेमलता मुलायम परिवार की पहली महिला बन गईं। उन्होंने राजनीति में कदम रखा। उनके बाद शिवपाल यादव की पत्नी और मुलायम की बहू डिंपल यादव का नाम आता है।
प्रेमलता के पति राजपाल यादव इटावा वेयर हाउस में नौकरी करते थे और अब रिटायर हो गए हैं। रिटायरमेंट के बाद से ही वह समाजवादी पार्टी में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। 2005 में चुनाव जीतने के बाद प्रेमलता ने अपना कार्यकाल बखूबी पूरा किया। इसके बाद 2010 में भी वह दोबारा इसी पद पर निर्विरोध चुनी गई हैं।
अंशुल और अभिषेक ने भी पकड़ी सियासी डगर

राजपाल और प्रेमलता से दो पुत्र हैं। एक हैं 27 वर्षीय अंशुल यादव और दूसरे 19 वर्षीय अभिषेक यादव। अंशुल यादव भी राजनीति का ककहरा सीख रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में अंशुल ने जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र के तहत आने वाले ताखा ब्लॉक में अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव के चुनाव प्रचार की कमान संभाली। अंशुल यादव इटावा व भरथना विधानसभा क्षेत्र में जोर आजमाइश में लगे हुए हैं। करीब दो साल से आम लोगों के बीच जा कर अंशुल यादव ने बूथ कमेटियों के गठन में प्रभावी भूमिका निभाई है। नोएडा से एमिटी यूनिवर्सिटी से एमबीए पास करने के बाद राजनीति के मैदान में कूदे अंशुल यादव कहते हैं कि पार्टी की ओर से उनको, जिस जिम्मेदारी का निर्वहन करने के लिए कहा गया है, उसी के तहत प्रचार का काम करने में लग गया हूं।
बाबा मुलायम के नक्शे कदम पर तेजू

इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट साइंस में एमएससी करके लौटे तेज प्रताप सिंह सक्रिय राजनीति में उतरने वाले मुलायम सिंह के परिवार की तीसरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुलायम के बड़े भाई रतन सिंह के पोते तेज प्रताप सिंह यादव उर्फ तेजू इस समय मैनपुरी से सांसद हैं। इटावा और आसपास के क्षेत्र में समाजवादी पार्टी को मजबूत करने की पूरी जिम्मेदारी तेज प्रताप सिंह ने अपने कंधों पर उठा रखी है।
परिवार के सदस्य इन्हें तेजू के नाम से भी पुकारते हैं। सैफई के पहले ब्लाक प्रमुख और सैफई महोत्सव के संस्थापक स्वर्गीय रणवीर सिंह यादव के बेटे तेजप्रताप यादव ने जसवंतनगर से अपने बाबा शिवपाल सिंह यादव की जीत में अहम योगदान दिया।
सैफई से निर्विरोध ब्लॉक प्रमुख चुने जाने के बाद तेज प्रताप यादव ने पिछले विधानसभा चुनाव में काफी मेहनत की। क्षेत्र के लोग कहते हैं कि तेज प्रताप से पहले उनके पिता रणवीर सिंह यादव चुनाव की जिम्मेदारी निभाते थे।
मुलायम का भांजा भी पार्टी को मजबूत करने में जुटा
मुलायम सिर्फ अपने ही परिवार नहीं चचेरे भाई प्रोफेसर राम गोपाल यादव के परिवार को भी पूरा संरक्षण देते रहते हैं। इसी क्रम में मुलायम की चचेरी बहन और रामगोपाल यादव की सगी बहन 72 वर्षीया गीता देवी के बेटे अरविंद यादव ने 2006 में सक्रिय राजनीति में कदम रखा और मैनपुरी के करहल ब्लॉक में ब्लॉक प्रमुख के पद पर वह निर्वाचित हुए। अरविंद क्षेत्र की जनता में काफी पहचान रखते हैं। अरविंद ने समाजवादी पार्टी को करहल में काफी मजबूती दिलाई है।
मुलायम के जीवन से जुड़ी 60 रोचक बातें।
2. गांव के प्रधान महेंद्र सिंह इकलौते थोड़े बहुत पढ़े लिखे व्यक्ति थे। मुलायम के पिता सुघर सिंह ने उनसे पढ़ाने की मिन्नतें की। सुघर सिंह, मुलायम का पढ़ाई के प्रति जज्बा देख कर तैयार हो गए। उन्होंने मुलायम को पढ़ाना शुरू कर दिया। महेंद्र सिंह दिन भर गांव का काम निपटाते और रात में चौपाल पर मुलायम को पढ़ाते।
3. मुलायम को पढ़ते देख अन्य परिवारों ने भी अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजना शुरू किया। बच्चों की रूचि को देखकर महेंद्र सिंह ने गांव वालों के साथ मिलकर एक झोपड़ी का इंतजाम किया जहां सिर्फ बच्चों के जमीन में बैठने का इंतजाम था।
4. उस स्कूल के पहले मास्टर सुजान ठाकुर हुए। सुजान ठाकुर ने बच्चों को बुलाकर उनसे सवाल जवाब किए और कुछ बच्चों को सीधे तीसरी कक्षा में दाखिला दिया। इसमें मुलायम सिंह यादव भी शामिल थे।
5. मुलायम के पिता सुघर सिंह उन्हें बड़ा पहलवान बनाना चाहते थे। यही वजह थी कि उन्होंने पहलवानी भी सीखी और मुलायम का मनपसंद दांव था चरखा दांव।
6. अखिलेश का जैसे निक नेम है टीपू। मुलायम का इस तरह का कोई नाम नहीं है। बचपन में भी लोग उन्हें मुलायम पहलवान के नाम से बुलाते थे।
7. मुलायम शुरू से ही जाति व्यवस्था में विश्वास नहीं करते थे। एक वाकया है, तीसरी कक्षा में एक उच्च जाति का लड़का एक जाटव छात्र को पीट रहा था। मुलायम ने ना सिर्फ मदद मांग रहे उस लड़के की मदद की, बल्कि पीटने वाले लड़के की पिटाई भी की थी।
8. मुलायम के पसंदीदा खेल गुल्ली-डंडा, खो-खो, कबड्डी और कुश्ती थे।
9. मुलायम 15 वर्ष की उम्र में राजनीति से जुड़े और लोहिया के आंदोलन में भाग लिया। लोहिया आंदोलन से जुड़ने के बाद वह गांव-गांव जाया करते थे। इसी वजह से वह बगल के गांव में पहुंचे। जहां नीची जाति के लोग रहते थे। अपने साथियों के साथ पहुंचे मुलायम सिंह ने उनका आतिथ्य भी स्वीकार किया जोकि उस ज़माने में घ्रणित माना जाता था। नीची जाति का आतिथ्य स्वीकार करने की वजह से मुलायम को सैफई गांव में पंचायत में हाजिर होना पड़ा था, लेकिन मुलायम ही वह शख्सियत हैं, जो किसी भी दबाव में झुके नहीं। उनसे जब कहा गया कि या तो अब नीची जाति के लोगों से मिलना छोड़ दो या जुर्माना दो, तो उन्होंने कहा जुर्माना दूंगा।
10. मुलायम सिंह यादव का बाल विवाह हुआ था। जोकि उनके चाचा ने कराया था। जबकि वह विरोध में थे। बाद में उन्होंने बाल विवाह, दहेज, मृत्यु भोज और जातिप्रथा जैसी व्यवस्थाओं के खिलाफ अभियान भी चलाया था।

11. मुलायम सिंह यादव पहला चुनाव छात्रसंघ का लड़े थे और जीते भी थे। उस समय उनके विरोध में खड़े लोग अमीर लोग थे। तब उन्होंने अपने संसाधन से फल-फूल खरीदे और अपने मित्र शिवराज सिंह यादव को दिए। तब उन्होंने यह फल लोगों तक पहुंचाए और लोगों को मुलायम के विचारों को बताया।
12. नत्थू सिंह मुलायम के राजनीतिक गुरु माने जाते हैं। मुलायम के करीबी बताते हैं कि मुलायम को राजनीति में लाने वाले नत्थू सिंह ही हैं। मुलायम की पहलवानी देखने आए वर्तमान समय के विधायक नत्थू सिंह उनके दाव पेंच से काफी खुश हुए। अखाड़े में जीते मुलायम को उन्होंने गले लगाया और कहा तुम बहुत आगे जाओगे।
13. वर्ष 1966 में इटावा में सभा को संबोधित करने आए डॉ. राम मनोहर लोहिया पहले भी मुलायम का नाम सुन चुके थे। मुलायम की सक्रियता देख कर ही, उन्होंने मुलायम से मिलने की इच्छा जताई थी।
14.पहली बार मुलायम सिंह यादव जब चुनाव लड़े, तो उनके खिलाफ कांग्रेस के लाखन सिंह यादव लड़े थे। विरोधी उनको नौसिखिया कह कर उनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन जमीन से जुड़े मुलायम ने उन्हें झटका देते हुए विधायकी जीती थी।
15.आपातकाल जब लगा था तो उसके दूसरे दिन ही मुलायम को मलेपूरा गांव से गिरफ्तार किया गया था। काफी भारी संख्या में फोर्स ने गांव को घेरकर यह करवाई की थी। जनता ने जब विरोध किया तो मुलायम ने सबको चुप करवा दिया था और गिरफ्तार हो गए थे। मुलायम गिरफ्तार होने के बाद 19 महीने इटावा जेल में रहे थे।
16.मुलायम की बढ़ती लोकप्रियता से परेशान होकर विरोधियों ने उन पर हमला भी करवाया था। 1984 में मैनपुरी के करहल ब्लाक के कुर्रा थाने के तहत महीखेडा गांव के बाहर उन पर लौटते वक्त हमला हो गया था। दरअसल मुलायम गांव में एक शादी में शामिल होने गए थे। तब हमलावरों ने उन पर झाड़ियों में छिपकर गोलियों से हमला कर दिया था। मुलायम ने चालाकी बरतते हुए सुरक्षाकर्मियों से कहा कि जोर जोर से चिल्लाओ नेताजी मार दिए गए। सुरक्षाकर्मियों ने वैसा ही किया और हमलावर उनकी बात सुनकर आश्वस्त होकर भाग गए। इस हमले में मुलायम के साथ चल रहे एक कार्यकर्ता की मौत हो गयी थी, जबकि एक अन्य घायल हो गया था।
17.चौधरी चरण सिंह ने मुलायम से प्रभावित होकर जालौन में एक सभा के दौरान उन्हें अपना बेटा बताया था और बस्ती में सभा के दौरान उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। चौधरी चरण सिंह की मृत्यु के बाद उनकी समाधि राजघाट के बगल में बनाने पर मुलायम अड़ गए थे। काफी जद्दोजहद के बाद उन्हें सफलता मिली थी।
18.1989 में जब मुलायम को राज्य का मुख्यमंत्री बनाने की बात हुई, तो कई लोगों ने विरोध किया, लेकिन 15 जनवरी 1989 को कानपुर में इकठ्ठा हुई दो लाख की भीड़ ने सबकी बोलती बंद कर दी। यही नहीं, पूरे राज्य से इकठ्ठा किया गया 51 लाख रुपए की थैली भी उन्हें पकड़ाई गई।
19.मुलायम को कमजोर करने के उद्देश्य से मुलायम के करीबी दर्शन सिंह यादव को विरोधियों ने तोड़ लिया इटावा में जिला परिषद के चुनाव को लेकर दर्शन सिंह और मुलायम में ठन गई थी। मुलायम ने राम गोपाल का नाम फाइनल किया, तो दर्शन सिंह विरोध में उतर आए और कांग्रेस की ओर से जसवंत नगर क्षेत्र में चुनाव लड़ा।
20.मुलायम पर एक बार फिर हमला हुआ था। चुनाव अभियान के तहत क्रांति रथ से चल रहे मुलायम पर हैवरा के पास एक मिल से काफी गोलियां चली। सड़क पर बम भी रखे गए थे। इस हमले में मुलायम क्रांति रथ के ड्राइवर हेतराम की चालाकी से बाल बाल बचे थे जबकि शिवपाल यादव इस हमले में जख्मी हो गए थे।

21. रामजन्म भूमि और बाबरी मस्जिद प्रकरण सुलझाने के लिए जो समिति बनायी गयी थी। उसमे मधु दंडवते, जार्ज फर्नांडिस और मुलायम सिंह थे। बाद में विरोध के चलते मुलायम को हटाकर मुख्तार अनीस को समिति में जगह दे दी गई। मुलायम से वीपी सिंह ने न तो समिति के बारे में शामिल करने के लिए पूछा था न ही बाहर करने के लिए।
22. मुलायम जब जैन इंटर कॉलेज में पढ़ा करते थे, तब एक बार कवि सम्मेलन हुआ था। जब कवि ने सरकार विरोधी कविता पढ़नी शुरू की तो वहां मौजूद पुलिस अफसर ने विरोध किया तो मुलायम तपाक से मंच पर चढ़े और उसे पटकनी मार दी।
23.मुलायम ने शुरूआती दौर में पढ़ाया भी है। तब के समय में शिक्षक को आदर से देखा जाता था। इसी सोच के तहत उन्होंने शिक्षक का पेशा चुना। इसके लिए उन्होंने बीटीसी की ट्रेनिंग भी ली थी। मुलायम सिंह सन 1989 से पहले मैनपुरी के करहल कस्बे में स्थित जैन इंटर कॉलेज में पढ़ाते थे। अब वह रिटायरमेंट ले चुके हैं। शिक्षक रहते हुए मुलायम ने सहकारी आंदोलन चलाया था। इसकी वजह से उनके भाई शिवपाल यादव का राजनीति में आने का रास्ता खुला था।
24.शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने जब दोबारा रामजन्म भूमि पर शिलान्यास करने का फैसला किया तो लाख विरोध के बावजूद मुलायम ने 30 अप्रैल 1990 को शंकराचार्य को गिरफ्तार कर लिया।
25.राजनीति में व्यस्त मुलायम ने हमेशा पढ़ाई को वरीयता दी। उन्होंने राजनीतिक जीवन से समय निकाल कर आगरा यूनिवर्सिटी से राजनीतिक शास्त्र की डिग्री ली।
26.मुलायम के करीबी दोस्त थे शिवराज सिंह यादव और गरीब दास।
27. मुलायम सिंह का परिवार देश का सबसे बड़ा राजनीतिक कुनबा है। इस सबसे बड़े राजनीतिक कुनबे से कुल 13 लोग क्रमश: मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, डिंपल यादव, शिवपाल यादव, राम गोपाल यादव, अंशुल यादव, प्रेमलता यादव, अरविंद यादव, तेज प्रताप सिंह यादव, सरला यादव, अंकुर यादव, धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव राजनीतिक धरातल पर जोर-आजमाइश कर रहे हैं।
28.पांच भाइयों में तीसरे नंबर के मुलायम सिंह के दो विवाह हुए हैं, पहली मालती देवी, रही हैं, जिनके निधन के पश्चात उन्होंने सुमन गुप्ता से विवाह किया। अखिलेश यादव मालती देवी के पुत्र हैं, जबकि मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे प्रतीक यादव को उनकी दूसरी पत्नी सुमन ने जन्म दिया है।
29.संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर पहली बार जसवंत नगर क्षेत्र से 28 वर्ष की आयु में मुलायम 1967 में विधानसभा सदस्य चुने गए। इसके बाद तो वे 1974, 77, 1985, 89, 1991, 93, 96 और 2004 और 2007 में बतौर विधान सभा सदस्य चुने गए। इस बीच वे 1982 से 1985 तक यूपी विधान परिषद के सदस्य और नेता विरोधी दल रहे। पहली बार 1977-78 में राम नरेश यादव और बनारसी दास के मुख्यमंत्रित्व काल में सहकारिता एवं पशुपालन मंत्री बनाए गए। इसके बाद से ही वे करीबी लोगों के बीच मंत्रीजी के नाम से जाने लगे।
30. दो नवंबर 1990 को अयोध्या में बेकाबू हो गए कारसेवकों पर यूपी पुलिस को गोली चलने का आदेश देकर मुलायम विवादों में आ गए थे, इस फायरिंग में कई कारसेवक मारे गए थे।
31.मुलायम के करीबी बताते हैं कि मुलायम की राजनीति की शुरुआत भी सहकारी बैंकों से हुई थी। करीब चालीस साल पहले बलरई कस्बे में सहकारी बैंक की शाखा खुली जिसमे मुलायम सिंह यादव भी चुनाव लड़ने के लिए खड़े हुए और आसपास के क्षेत्रों के मास्टर जो सहकारी समिति के सदस्य थे उनके वोट से वह जीते थे।
32.लोहिया के 'नहर रेट आंदोलन' में मुलायम ने भाग लिया और पहली बार जेल गए।
33.मुलायम को 1977-78 में जब पहली बार मंत्री बनाया गया, तो उन्होंने एक क्रान्तिकारी कदम उठाया था, जिससे न केवल प्रदेश को फायदा हुआ बल्कि कहने तो समाजवादी पार्टी में आज के परिवारवाद की नींव भी उसी समय पड़ी। बतौर उत्तर प्रदेश के सहकारिता एवं पशुपालन मंत्री मुलायम सिंह यादव ने पहले किसानों को एक लाख क्विंटल और उसके दूसरे साल 2160 लाख क्विंटल बीज बंटवाए। उनके इसी कार्यकाल में उत्तर प्रदेश में डेयरी का उत्पादन बढ़ा।
34.मुलायम के सिर पर वर्ष 1992 में एक और सेहरा बंधा जब उन्होंने पांच नवंबर 1992 को लखनऊ में समाजवादी पार्टी की स्थापना की गई। भारत के राजनैतिक इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण अध्याय था, क्योंकि लगभग डेढ़-दो दशकों से हाशिये पर जा चुके समाजवादी आंदोलन को मुलायम ने पुनर्जीवित किया था।
35.इसके अगले वर्ष ही 1993 में हुए विधान सभा चुनावों में समाजवादी पार्टी का गठबंधन बीएसपी से हुआ। हालांकि इस गठजोड़ को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, लेकिन जनता दल और कांग्रेस के समर्थन के साथ उन्होंने दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
36. मुलायम सिंह यादव सपा के अध्यक्ष होने के पहले उत्तर प्रदेश लोकदल और उत्तर प्रदेश जनता दल के अध्यक्ष भी रहे हैं।
37. मशहूर पत्रकार स्वर्गीय आलोक तोमर ने अपने संस्मरण में लगभग 42 वर्ष पुरानी घटना का जिक्र करते हुए एक जगह लिखा है, "उन दिनों बलरई में सहकारी बैंक खुली। ये चालीस साल पुरानी बात है। मास्टर मुलायम सिंह चुनाव में खड़े हुए और इलाके के बहुत सारे अध्यापकों और छात्रों के माता पिताओं को पांच पांच रुपए में सदस्य बना कर चुनाव भी जीत गए।
38. मुलायम सिंह यादव कब किससे नाराज हो जाएं और कब किसको समर्थन दे बैठे, शायद उन्हें भी इसका अंदाजा नहीं रहता। मुलायम ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए पहले ममता बनर्जी के साथ जाने का एलान किया फिर पलट गए और कांग्रेस प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी के नाम पर मुहर लगा दी। इसके बावजूद उन्होंने मतदान के समय पीए संगम के नाम के आगे मुहर लगा दी।
39. मुलायम सिंह तीन बार यूपी की कमान बतौर सीएम संभल चुके हैं।
40.मुलायम सिंह के बारे में प्रचलित है कि उन्होंने अपने दोस्तों को धोखा दिया है। जिसमे अजित सिंह, चंद्रशेखर, वामपंथी, ममता बनर्जी और यूपीए सरकार भी शामिल है। बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के चलते मुलायम ने कुछ ऐसे राजनीतिक दांव चले जो दोस्तों के लिए घटक साबित हुए।
41.मुलायम की पत्नी मल्टी देवी को अखिलेश यादव के रूप में 16 साल बाद पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी।
42. 1967 में 28 साल के मुलायम सबसे कम उम्र के विधायक बनके विधानसभा पहुंचे थे। यही से उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत हुई थी।
43.बाद में मुलायम के विरोधी बने सैफई गांव के दर्शन सिंह ने मुलायम के पुत्र का नाम टीपू रखा था। दर्शन सिंह तर्क देते हैं कि उस ज़माने में या तो महापुरुषों के नाम पर नामकरण किया जाता था या फिर देवी देवताओं के नाम पर।
44.मुलायम की इच्छा पर ही यूपी सरकार इटावा लायन सफारी को विकसित कर रही है।
45.जाति व्यवस्था को तोड़ते हुए मुलायम सिंह यादव और राजनारायण दलितों को लेकर कशी विश्वनाथ मंदिर में घुसे थे।
46.मुलायम की तरह अखिलेश यादव ने भी कुछ दिनों तक सैफई गांव में पढ़ाई की है।
47.मुलायम के बेटे टीपू का दूसरा नाम उनके पारिवारिक दोस्त एडवोकेट एसएन तिवारी ने अखिलेश रखवाया था। एसएन तिवारी ने ही इटावा में अखिलेश का मुलायम के कहने पर सेंट मैरी स्कूल में एडमिशन करवाया था।
48.मुलायम की पहली पत्नी मालती देवी को मिर्गी का दौरा पड़ता था। हालांकि उनका बेहतरीन इलाज करवाया गया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ था।
49.अखिलेश के जन्म के समय तक मुलायम इटावा से निकल कर लखनऊ में एक किराए के मकान में रह कर राजनीति करते थे।

50.मुलायम की पहली पत्नी मालती देवी की मौत 25 मई 2003 को हुई थी।
51.मुलायम ने करनाल के जैन इंटर कॉलेज से इंटरमीडियट की पढ़ाई पूरी की। बाद में केके कॉलेज से पढ़े।
52.यूपी के फिरोजाबाद जिले के बीटी डिग्री यानि शिक्षण में स्नातक की डिग्री हासिल करने मुलायम शिकोहाबाद कॉलेज गए। उनके मन में शिक्षक बनने की इच्छा थी।
53.शिक्षक बन कर मुलायम ने जैन इंटर कॉलेज में ही बच्चों को पढ़ाने पहुंचे। यहां से मुलायम ने इंटर पास किया था।
54.मुलायम ने अपने छोटे भाई शिवपाल यादव को जैन इंटर कॉलेज में बतौर शिक्षक पढ़ाया है।
55.मुलायम ने विधायक बनने के बाद एमए किया। वह घंटी बजने के बाद परीक्षा हाल में पहुंचते थे और घंटी बजने से पहले पेपर ख़त्म कर चले जाते थे। ताकि उत्साही छात्रों की भीड़ से बच सके।
56.मुलायम के साथ साथ उनके पांचों भाई और चचेरे भाई रामगोपाल यादव भी कुश्ती लड़ते थे।
57.मुलायम जब से शिक्षक बने तब से उन्होंने अखाड़े में उतरना बंद कर दिया था। हालांकि वह कुश्ती के आयोजन करवाया करते थे।
58.मुलायम का बड़ा राजनीतिक कुनबा होने के बावजूद उनके एक भाई अभय राम आज भी सादगी भरा जीवन सैफई में रहकर जीते हैं। आज भी वह खेतों में काम करते दिखेंगे। इसी तरह उनके भाई रतन सिंह भी किसानी में रमे थे, लेकिन उनकी हाल ही में मृत्यु हो गई।
59.जब मुलायम जेल में थे तो उन्होंने अपने छोटे भाई शिवपाल यादव को अपना संदेशवाहक बनाया था। तब शिवपाल पढ़ाई करते थे और साथ साथ मुलायम के दिए सन्देश उनके समर्थकों को पहुंचाते थे।
60.38 साल की उम्र में मुलायम पहली बार कैबिनेट मंत्री बने थे और 38 साल की उम्र में उनके बेटे अखिलेश यादव पहली बार यूपी के सीएम बने हैं।

